खबर बैतूल मध्य प्रदेश से
जिला बैतूल जिला सत्र न्यायालय में व्यवस्था के नाम पर केवल खानापूर्ति नजर आयी हर दिन मानो साप्ताहिक बाजार जैसा माहौल नजर आता है। चारों ओर लोगो की दुपहिया गाड़िया अव्यवस्थित खड़ी है ।और अधिवक्ता शेड में अपनी अपनी दुकान सजाए नजर आते है। जहां जनता भीड़ लगाए अपना काम करवाती है। बस कमी है। तो ये बेचारे बेबस अधिवक्ता आवाज नहीं लगाते अपना टेबल अपनी कुर्सी अपनी बेंच अपना पंखा लिए शेड में बैठते है। और तो और असुरक्षा इतनी की अपनी कुर्सी टेबल को भी जंजीरों से बांध कर रखना पड़ रहा है। क्या पता अगले दिन जब वे आए तो टेबल कुर्सी ही न मिलें न्याय व्यवस्था में अधिवक्ता का अहम किरदार होता है।
जो अपने पक्षकार का पक्ष न्यायधीश के समक्ष पेश करता है। वो अधिवक्ता इतनी बेबसी लाचारी में गर्मी में तपती टीन शेड के नीचे बैठ कर अपने मुवक्किल के केस की तैयारी करता है। अभी कुछ दिनों में बारिश आएगी तब हाल और भी गजब होगा टीन शेडो में पानी होगा और वकील साहब सबसे पहले अपनी पतलून ऊपर मोडे पानी साफ करते नजर आएंगे न्यायालय परिसर में अधिवक्ता के हितों के लिये कोई कार्य नहीं होता बेचारे अधिवक्ता अपनी समस्याओं को लेकर दबी जुबान में एक दूसरे से अपना दर्द साझा करके ही आत्मसंतुष्टि कर लेते है। हमने भी कुछ अभिकर्ताओं से बात करी पर वे कैमरे पर अपनी बात रखने से परहेज करते नजर आये कारण बार काउंसिल की सदस्यता उन्हें बेबस बनाती है। दबे स्वर में उन्होंने अपनी समस्याओं से अवगत कराया की यहां बैठने की व्यवस्था नहीं है। पेयजल जैसी मूलभूत व्यवस्था तक नहीं है एक सार्वजनिक शौचालय है ।वो भी कई महीनों से निर्माणाधीन है। भोजन करने के लिए कोई स्थान नहीं है। दुकानदारों की तरह अपनी दुकान में ही खाना खाना पड़ता है।
परिसर में कोई कैंटिन व्यवस्था नहीं हैं। हर बार बार काउंसिल का चुनाव होता है। जिसमें उम्मीदवार नेताओं के जैसे जुमले देकर अधिवक्ता के हितों की बात करते हैं। चुनाव खत्म वादे भी खत्म। अधिवक्ता फिर बेबस लाचार सा अपनी दुकान चला रहा है। इस से बत्तर हाल बेचारे टाइपिस्टों स्टांप विक्रेता ओ का है । कुछ तो प्रशासनिक जर्जर इमारत में तो कुछ न्याय परिसर में बनी एक पुरानी कुटिया में अपना कार्य कर रहे है। न्यायलय को इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए। और इन अव्यवस्थाओं को दूर करने की दिशा में कार्य करना चाहिए इस लेख का उद्देश्य केवल न्यायालय का इन समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षण करना है। ना कि किसी व्यवसाय या संघ का उपहास करना
विजय मालवीय की न्यूज
ब्यूरो चीफ
दीवार पोत दूंगा ... से



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