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पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर त्रिशताब्दी वर्ष श्रृंखला= 61 अहिल्यादेवी और तुकोजीराव भाग एक सन 1767 में अहिल्यादेवी मालवा की शासक बनी।

 पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर त्रिशताब्दी वर्ष 

श्रृंखला= 61 अहिल्यादेवी और तुकोजीराव भाग एक 



सन 1767 में अहिल्यादेवी मालवा की शासक बनी। उज्जैन महादजी शिंदे की राजधानी थी अतः वे उज्जैन राजकाज का कार्य देखने लगे। इंदौर में सैनिक छावनी थी इसलिए तुकोजीराव इंदौर में कामकाज देखते थे। अहिल्यादेवी की राजधानी महेश्वर थी। मालवा का मुख्य व्यवहार महेश्वर से ही संचालित किया जाता था। 


पेशवा धन के लिए होलकर पर निर्भर थे। महादजी को अहिल्यादेवी ने 30 लाख का ऋण देकर सहायता की थी इसीलिए  वे आर्थिक संकट से उभर सके। यदि अहिल्यादेवी ने महादजी शिंदे की आर्थिक सहायता नहीं की होती तो शायद महादजी एक सक्षम शासक नहीं बन पाते। सन 1768 के बाद होलकर और शिंदे को पेशवा की दो आँख कहां  जाने लगा। अहिल्यादेवी ने जिस क्षण राज्य की प्रशासनिक बागडोर संभालनी शुरू की तब उनके खून के रिश्ते बहुत कम थे। अत: अहिल्यादेवी के मायके चोंडी से दो सगे भाई  शहाजी और महादजी शिंदे का महेश्वर आना जाना लगा रहता था।


तुकोजीराव धन कमाने में गड़बड़ करते थे। जब भी मुहिम पर जाते थे वहां से चिट्ठियाँ लिखकर अहिल्यादेवी को धन की तंगी का हवाला देकर रुपयों की मांग करते थे। अहिल्यादेवी इस व्यवहार से बहुत नाराज रहती थी । 

सन 1769 में माधवराव पेशवा युद्ध अभियान में थे तब उनके साथ रामचंद्रपंत कानडे, महादजी शिंदे, तुकोजीराव होलकर युद्ध अभियान में थे। तुकोजीराव रणभूमि में रूपयों की जरूरत को पूरा करने के लिए प्रयासरत रहते थे। जब तुकोजीराव को कहीं से भी रुपयों की आवश्यकता पूर्ण होती नहीं दिखाई पड़ती थी तो लोकमाता को पत्र लिखकर रुपयों की मांग करते थे। अत: अहिल्यादेवी भी जब रुपयों की मांग को टाल देती थी तो तुकोजीराव तहसीलों से मिलने वाली आय को फौज के लिये उपयोग में लेने लगे। अहिल्यादेवी इससे बिल्कुल सहमत नहीं थी और बोली : 

“तुकोजी का यह व्यवहार अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, कैसे समझाया जाए, श्वसुर जी जब भी रणभूमि में जाते थे तो फौज के खर्चे के लिए वही से रुपयों का इंतजाम करते थे।”

एक बार तुकोजीराव ने तराणे में छावनी की, उन्हें रुपयों की तंगी महसूस होने लगी तब उन्होंने कुसाजी महीपतराव के पास ‘वरात’ भेजी और वहां से रुपये उधार लिए । अहिल्यादेवी को तुकोजीराव के इस व्यवहार की जानकारी मिली, वे दुःखी हुई। उन्होंने तत्परता से कमाविसदार को पत्र लिखकर आदेश भेजा :-

 “किसी भी स्थिति में तुकोजीराव रूपयों की मांग करें तो हमारी आज्ञा के बगैर रकम नहीं दी जानी चाहिये।”

अहिल्यादेवी की कार्यपद्धति यहां विशेष रूप से ध्यान आती हैं कि वे तुकोजीराव के आर्थिक व्यवहार में सुधार हेतु प्रयास करती थी । निरंतर—- 

संदर्भ - बहुआयामी व्यक्तित्व अहिल्यादेवी भाग एक 

लेखिका - आयुषी जैन 

प्रकाशक- अर्चना प्रकाशन भोपाल

संकलन- स्वयंसेवक एवं टीम 

प्रस्तुति... अशोक जी पोरवाल

🙏🕉️हर हर महादेव 🕉️🙏

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