पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर त्रिशताब्दी वर्ष
श्रृंखला= 57 अहिल्यादेवी और लाल बहादुर शास्त्री भाग तीन
पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर नीव के पत्थर की तरह कार्य करती थी, अपने स्वयं के खासगी कोष से पूरे भारतवर्ष मे मंदिरों का जीर्णोद्धार और निर्माण करवाया लेकिन किसी भी स्थान पर वे स्वयं का नाम नहीं लिखवाती थी। अहिल्यादेवी ने देशभर मे अनगिनत संख्या मे मंदिरों के निर्माण व जीर्णोद्धार करवाये थे किन्तु अहिल्यादेवी कहती थी कि उन्होंने कुछ नहीं किया हैं, सब भगवान शंकर जी कर रहे हैं, अहिल्यादेवी ने व्यक्तिगत खासगी कोष के नाम से मंदिरों के निर्माण व जीर्णोद्धार के संबंध मे ढोल नहीं पीटा, वे प्रसिद्धि परांगमुख स्त्री थी।
अहिल्यादेवी की तरह ही लालबहादुर शास्त्री जी भी प्रसिद्धि परांगमुख शासक थे। संघ का एक स्वयंसेवक शास्त्री जी का बहुत करीबी मित्र था, उसने शास्त्री जी से कहां आप इतने अच्छे कार्य करते हो लेकिन मीडिया वाले से दूर भागते हो, कम से कम अपने सदाचार कार्यो का प्रचार- प्रसार तो करना ही चाहिये, आज तो इस के पीछे का राज आपको मुझे बताना ही होगा शास्त्री जी। स्वयंसेवक की बात सुनकर शास्त्री जी बोले : मित्र आज तुम्हें राज बता ही देता हूँ, ताजमहल मे दो तरह के पत्थर हैं, एक संगमरमर हैं, जिसके आस पास गुंबद बने हुवे हैं, दुनिया सिर्फ इन्ही की प्रशंसा करती हैं, दूसरे हैं, नींव के पत्थर जिसकी कोई प्रशंसा नहीं करता हैं किन्तु पूरा ताजमहल उस नींव पर ही टिका हुआ हैं। यदि किसी भी कार्य या वस्तु की नींव मजबूत होगी तो उसमे कभी भी असफलता मिल ही नहीं सकती हैं, मैं चाहता हूँ की लोग मुझे नींव का पत्थर ही समझे, संगमरमर का नहीं। शास्त्री जी की बात सुनकर स्वयंसेवक उनके आगे श्रद्धा से नतमस्तक हो गया और बोला कि सर आप तो सच मे नीव के पत्थर ही हैं।
संदर्भ - बहुआयामी व्यक्तित्व अहिल्यादेवी भाग एक
लेखिका - आयुषी जैन
प्रकाशक- अर्चना प्रकाशन भोपाल
संकलन- स्वयंसेवक एवं टीम
प्रस्तुति... अशोक जी पोरवाल
🕉️हर हर महादेव

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