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हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 93 = राजधानी रायगढ़ भाग दो

 हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 93 = राजधानी रायगढ़

भाग दो


चंद्रराव था महाराज की छावनी में परन्तु उसका मन बीजापुर की ओर थाl उसने मुधोळ के बाजी घोरपडे को पत्र भेजना शुरू किया - बाजी घोरपडे आदिलशाह दरबार की चाकरी करता थाl ये पत्र महाराज के गुप्तचरों ने पकडकर जब्त कियेl उसने भागने का प्रयत्न किया परन्तु वह पकड़ा गयाl महाराज अब उसे क्षमा करने की मनःस्थिति में नहीं थेl महाराज ने चंद्रराव व उसके दोनों बेटे बाजी एवं कृष्णाजी की गर्दन उडाने का हुक्म दिया - दि.27 अगस्त 1656 के बाद l

जावळी के साथ उस क्षेत्र के चंद्रगढ़, मकरंदगढ़ कांगोरी, सोनगढ़, चाम्भारगढ़ ये दुर्ग भी स्वराज्य में शामिल हुएl जावळी जैसा स्थान अर्थात (अजिंक्य ) अजेय गुंफा!महाराज का ध्यान जावळी के पास एक पहाड़ी पर गया पारघाटी के मुहाने पर व रडतोंडी घाटी के नाक के सामने - भोरप्या डोंगरl दूरदर्शी महाराज को उस पहाड़ी में एक रखवालदार नजर आयाl केवल जावळी ही नहीं सम्पूर्ण स्वराज्य की रखवाली यह पहाड़ी कर सकती है इसलिए महाराज ने मोरोपंत जी पिंगळे को उस पहाड़ी को दुर्ग का स्वरुप देने के लिए निर्माण कार्य करने का कार्य सौपा l

महाराज ने रायरी का नामकरण

' रायगढ़ ' किया वैसे ही चाकण का गढ़ ' संग्रामदुर्ग ', रोहिडे का ' विचित्र गढ़ ' व तोरणे का ' प्रचंडगढ़ ' यह संभवतः एक ही समय की बात है l

रायगढ़ की समुद्र सतह से ऊँचाई 820 मीटर हैl गढ़ चढ़ने के लिए 1737 सीढियाँ हैंl गढ़ के नीचे की ओर मैदान में रायगडवाडी व पाचाड दो गाँव थे l

रायगढ़ दुर्ग अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है तथा उसमें महत्वपूर्ण है महाराज का राज्याभिषेक!

सन 1689 में झुल्फीखार खान ने गढ़ पर कब्जा किया तथा उस समय औरंगजेब ने इसका नाम इस्लामगढ़ कियाl सन 1707 से 1733 तक गढ़ सिद्दी फतेखान के कब्जे में थाl इसके बाद मराठों ने इसपर फिरसे अधिपत्य स्थापित किया तथा सन 1818 तक इसे संभालाl यह महत्वपूर्ण राजकीय केंद्र होने के कारण कालकाई पहाड़ी पर रखी तोपों से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1818 में गढ़ पर हमला किया तथा इसे अपने कब्जे में लिया l

रायगढ़ के मुख्य वास्तुविशारद हिरोजी इंदुलकर थेl मध्यभाग में स्थित राजवाडे का निर्माण लकड़ी से किया गया थाl गढ़ का केवल एक प्रवेश द्वार था विशाल अथवा महादरवाजाl स्वराज्य की राजधानी के समय यह दरवाजा सूर्यास्त के समय बंद किया जाता थाl यह दरवाजा भक्कम था इसे हाथी भी नहीं तोड सकता थाl महाद्वार के दोनों तरफ 60-70 फीट ऊँचे बुरुज थेl इस दरवाजे से 600 फीट की ऊँचाई पर गढ़ का माथा था l

कल्याण का सुबेदार मुल्ला अहमद खजाना लेकर जा रहा था, वह खजाना लेकर उस धन का उपयोग गढ़ के निर्माण के लिए किया गयाl धन अपनी प्रजा का ही था, गलत हाथों से लेकर उसका उपयोग स्वराज्य के पावन कार्य के लिए किया गयाl महाराज ने इस गढ़ को राजधानी इसलिए बनाया क्योंकि गढ़ दुर्गम था, शत्रु आसानी से इसे जीत नहीं सकता था तथा गढ़ समुद्र के पास

 था इसलिए सुरक्षित एवं व्यापार हेतु भी लाभकारी था l

महाराज के सिंहासन के सामने नगारखाना दरवाजा था, उस हिस्से का निर्माण इस प्रकार से किया गया था कि दरवाजे से कुछ बात करने पर सिंहासन तक सुनाई देता था, ऐसा ध्वनिनियंत्रण 16 वी शताब्दी में करना यह वास्तुविशारद के कौशल की ही निपुणता रही होगीl इससे सिद्ध होता है कि हिन्दवी स्वराज्य प्रगतिशील साम्राज्य था l

गढ़ पर एक ओर दरवाजा था, वह केवल महिलाओं के आने-जाने के लिए था, उसका नाम था ' मेणा दरवाजा ', उस समय महिलाएँ मेणे में बैठकर आती-जाती थी, मेणा अर्थात आच्छादित बंद पालकीl राजा व उसके लोगों के लिए ' पालकी दरवाजा ' थाl एक स्थान था  

' टकमक टोक ' यह फाँसी/मृत्युदंड की सजा का स्थान थाl 16 वी शताब्दी में भी चारों ओर पानी की निकास व्यवस्था अच्छी थी, वर्तमान युग के वास्तुविशारद भी यह व्यवस्था देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैंl गढ़ पर भूमिगत तलघर भी था जिनका उपयोग खजाना रखने एवं गुप्त बैठकों के लिए किया जाता था l

एक ओर दरवाजा था जिसका नाम था ' वाघ दरवाजा ' यह आपातकालीन दरवाजा था एवं सामने से दिखाई नहीं देता थाl इतिहास कहता है बाद में राजाराम महाराज इसी दरवाजे से गढ़ पर से सुरक्षित निकल गये थे l

गढ़ की सीढी पर ' सेवा हेतु तत्पर हिरोजी इंदुलकर ' ऐसा लिखा हुआ हैl

गढ़ पर तालाबों का निर्माण भी किया गया था, मुख्य रूप से तीन तालाब थे, कुशावर्त तालाब, हाथियों के स्नान के लिए व उन्हें पानी पीने के लिए हाथी तालाब, शिबन्दी अर्थात सैनिकों के लिए गंगासागर तालाब l

गढ़ पर ओर भी अन्य भवन थे जैसे

शिरकाई मंदिर, जगदीश्वर मंदिर, राजभवन, सभी रानीयों के महल,

 होली मैदानl बाजार की रचना भी अप्रतिम थी, दोनों ओर 22-22 दुकानें थीl इन दुकानों की ऊँचाई 7 से 8 फीट थी, उसका कारण था जो कोई अश्व पर अथवा पालकी में बैठकर आएगा उसे नीचे न उतरते हुए भी बैठे-बैठे सामान खरीदने की सुविधा हो, दोनों तरफ की दुकानों के बीच एक लम्बा-चौडा रास्ता थाl

इसके अतिरिक्त एक नाना अर्थात छोटा दरवाजा भी थाl महाद्वार पर श्री व सरस्वती की मुर्तियाँ थीl तटबंदी में बन्दुकों से निशाना साधने के लिए छेद भी थे ताकि बैठे-बैठे सैनिक निशाना लगा सकेंl पहरेदारों के लिए वायव्य दिशा में ढयोढी (पोर्च ) बनायी गयी थीl

राजभवन चौथी मंजिल पर था जिसका आकार 86 गुणा 33 फीट थाl जहाँ महाराज का राज्याभिषेक संपन्न हुआ था उस राज्यसभा का आकार 220 गुणा 124 फीट था, उसमें महाराज के लिए 32 मण सोने का सिंहासन बनाया गया था l

गढ़ पर अष्टप्रधान मंडल के महल, नगारखाना, राजसेवकों के घर, अश्वशाला, गजशाला, गौशाला, अट्ठारह कारखाने, अधिकारीयों के घर थेl गढ़ मीनारों से भी सुसज्जित किया हुआ था l

मुगलों के आक्रमण से हानि पहुँची वैसे ही अंग्रेजों की तोपों के मार से अधिकतर हिस्सा जल गया, वर्तमान में वह बचे हुए अवशेष जले हुए दिखाई देते है l

राजधानी का स्थान कैसे सुरक्षित व सर्व सुविधा पूर्ण हो ' रायगढ़ ' उसका उदाहरण है l

सन्दर्भ -- राजा शिवछत्रपति

लेखक -- महाराष्ट्र भूषण व पद्म विभूषण बाबासाहेब पुरंदरे

संकलन -- स्वयंसेवक एवं टीम

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