आज की बोध कथा =
एक भ्रम
एक बार कागज का एक टुकड़ा हवा के वेग से उड़ा और पर्वत के शिखर पर जा पहुँचा। पर्वत ने उसका आत्मीय स्वागत किया और कहा-भाई! यहाँ कैसे पधारे? कागज ने कहा-अपने दम पर।
जैसे ही कागज ने अकड़ कर कहा किअपने दम पर, कि तभी हवा का एक दूसरा झोंका आया और कागज को उड़ा ले गया।
अगले ही पल वह कागज नाली में गिरकर गल-सड़ गया। जो दशा एक कागज की है वही दशा हमारी भी है।
पुण्य की अनुकूल वायु का वेग आता है, तो हमें शिखर पर पहुँचा देता है और यदि पाप का झोंका आता है तो रसातल पर पहुँचा देता है। किसका मान, और किस चीज का गुमान?
सन्तजन कहते हैं कि जीवन की सच्चाई को समझो। संसार के सारे संयोग हमारे अधीन नहीं हैं, प्रत्यित कर्म के अधीन हैं; और कर्म कब कैसी करवट बदल ले, कोई भरोसा नहीं।
इसलिए कर्मों के अधीन परिस्थितियों का कैसा गुमान?
बीज की यात्रा वृक्ष तक है, नदी की यात्रा सागर तक है,और मनुष्य की यात्रा परमात्मा तक।
संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और इस संसार के सभी जीव तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी यह भ्रम नहीं पालना है कि मैं न होता तो क्या होता?
🙏🙏🙏
*जय जय सियाराम*
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