हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 92 = राजधानी रायगढ़
भाग एक
जावळी का चंद्रराव मोरे स्वराज्य के छत्र के नीचे आने के लिए तैयार नहीं थाl उसे स्वतंत्र वतन का वतनदार बनने की इच्छा थीl एक होकर रहने में लाभ है यह समझाने का महाराज ने प्रयास किया परन्तु चंद्रराव के अति महत्वकांक्षी स्वभाव के कारण प्रयास सफल नहीं हुआ l
महाराज ने कठोर शब्दों में पत्र भेजा, " जावळी खाली करो, हाथ पीछे बांधकर मिलने आना, अन्यथा मारे जाओगेl " स्वराज्य बलशाली बनाने के लिए यह सब करना आवश्यक भी था अन्यथा मुल्क छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा रहता तथा सुलतानशाही इसका लाभ उठाकर अपने पैर यहाँ जमाकर जनता पर अत्याचार करती क्योंकि वतनदार मराठा परन्तु वे चाकर, शासन व हुक्म अत्याचारी सुलतान का ऐसी विचित्र परिस्थिति थी l
यह पत्र पढ़कर भी चंद्रराव अकड़ता रहा एवं हणमंतराव मोरे ने उसका साथ दियाl चंद्रराव ने उत्तर भेजा, " आप जावळी आते हो तो आओ, यहाँ बारूद की कोई कमी नहीं है l "
महाराज ने ही जावळी चंद्रराव के हाथ में सौपी थी परन्तु केवल व्यवस्था देखने के लिएl उसका यह जवाब पढ़कर, इस कृतघ्न को सजा देने का निश्चय महाराज ने किया क्योंकि मूर्खों को समझाना भी मूर्खता है!महाराज ने कान्होजी जेधे,हैबत राव शिळमकर,संभाजी कोंढाळकर, बांदल नाईक,रघुनाथ पंत सबनिस को बुलाया एवं कहा, " चंद्रराव मोरे को मौत के घाट उतारे बिना काम नहीं चलेगा, पंत आप स्वयं इस मुहिम पर जाइये l "
कुछ हथियारबंद सिपाही लेकर सभी जावळी के लिए रवाना हुएl जावळी में चंद्रराव के साथ हणमंतराव व प्रतापराव मोरे भी थेl पंत चंद्रराव से बात करने गये परन्तु चंद्रराव बात सुनने के लिए तैयार नहीं थेl यह देखकर स्वराज्य के मावळ सिपाहियों ने चतुर्बेट,जोहोर खोरे, शिवथर खोरे व जावळी पर एकसाथ हल्ला बोलाl चंद्रराव स्वयं, उसके साथी, सिपाही चारों ओर से पकड़े गये,मराठों के शस्त्र शत्रु पक्ष के सिपाहियों को अचूक निशाना बनाने लगेl संभाजी कोंढाळकर के वार से हणमंतराव स्वर्ग पहुँचाl मोरे व उनकी सेना मराठों का सामना नहीं कर सकी, मोरे के बहुत से सिपाही मारे गयेl अब जावळी हाथ से जाते हुए देखकर चंद्रराव भाग गयाl महाड के पास ' रायरी गढ़ ' पर आश्रय के लिए गयाl प्रतापराव जंगल में छिपते- छिपते बीजापुर पहुँच गयाl दि.15 जनवरी 1656 को जावळी पर मराठों का कब्जा हुआ l
महाराज ने कृष्णाजी बाबाजी को वहाँ का सुबेदार नियुक्त कियाl विरो राम को मुजुमदार नियुक्त कियाl गणशेट शेटे को बुलाकर व्यवस्था सम्बंधित पूछताछ की व व्यवस्था उसके अनुसार जारी रखी l
महाराज जावळी से रायरी गये जहाँ चंद्रराव छुपकर बैठा था - दि.06 अप्रेल 1656 एक महीना बीत गया परन्तु चंद्रराव शरण आने के लिए तैयार नहीं हुआl महाराज गढ़ के नीचे धरना देकर बैठ गयेl अंत में चंद्रराव ने अपनी तलवार महाराज के चरणों में रखीl महाराज का मन विशाल थाl उन्होंने चंद्रराव को जीवनदान दियाl महाराज ने सोचा मराठा है,अनुभव से सीख जाएगा,उसे जावळी भेजकर स्वराज्य की सेवा के लिए समझाया जा सकता हैl उसे सम्मान से बुलाया, वस्त्र दिये,अश्व दियाl उसे सेना के साथ रखकर महाराज गढ़ पर गयेl गढ़ बहुत भव्य था, 6 मील की चढ़ाई थीl महाराज ने गढ़ की मरम्मत का हुक्म दियाl महाराज ने रायरी गढ़ को नाम दिया ' रायगढ़ 'l रायगढ़ की ऊँचाई दौलताबाद के किले की ऊँचाई से दस गुणा है l निरन्तर
सन्दर्भ -- राजा शिवछत्रपति
लेखक -- महाराष्ट्र भूषण व पद्म विभूषण बाबासाहेब पुरंदरे
संकलन -- स्वयंसेवक एवं टीम

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