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हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 90 = कोंढाणा दुर्ग भाग दो

 हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 90 = कोंढाणा दुर्ग भाग दो


शहाजीराजे को बंदी बनाकर मुस्तफा खान तो मर गया परन्तु शहाजीराजे को बीजापुर लाने का उसका अधूरा काम अफजलखान ने पूर्ण कियाl बंदी बनाकर, हाथी पर बिठाकर वह उन्हें बीजापुर लाया, हाथ पैरों में बेड़ियाँ थी, उस स्थिति में उन्हें अपमानित करने के लिए बीजापुर के रास्तों पर घुमायाl शायद उसी समय आदिलशाह उन्हें मौत के घाट उतार देताl परन्तु शहाजीराजे के कैद की खबर सुनकर शिवाजीराजे ने मुगल बादशाह शाहजहां के लिए उसका बेटा मुरादबक्श को पत्र भेजा, " मैं एवं मेरे पिताजी आपकी चाकरी करेंगे, इस आशय का फरमान आप भेजे, हमारे पिताजी को बीजापुर के बादशाह ने कैद कर रखा है, उनकी रिहाई के बाद हम दोनों आपकी सेवा में हाजिर होंगेl " ऐसा होनेवाला था क्या? कभी नहीं केवल पिताजी की रिहाई के लिए शहद लगी ऊँगली शिवाजीराजे ने मुगल बादशाह की ओर की थीl यह शूरवीर पितापुत्र की जोड़ी मुगलशाही को मिलती तो क्या बात थी!शाहजहां एक पैर पर इसके लिए तैयार हो जाता l

शिवाजीराजे ने इस आशय का पत्र मुगल दरबार को भेजा है यह खबर बीजापुर दरबार पहुँचीl इस राजनीति से आदिलशाह डर गयाl शहाजी को बंदी बनाकर रखते है तो मुसीबत एवं मुक्त करते है तो इज्जत मिट्टी में मिलने का डर - एक तरफ आग व दूसरी तरफ खाईl फिर आदिलशाह ने एक रास्ता ढूंढा, उसने शहाजीराजे को सम्मानपूर्वक रिहा करने की तैयारी कीl तारीख थी 16 मई 1649 जेष्ठ पूर्णिमा - इतिहास इसकी तुलना समान तिथि होने के कारण पतीव्रता सावित्री ने यमराज से सत्यवान के प्राण बचाए थे उस घटना से करता है - वह भी जेष्ठ पूर्णिमा व यह भी जेष्ठ पूर्णिमा! माँसाहेब के खुशी का पारावार नहीं था - सुहाग की भी रक्षा हुई एवं स्वराज्य भी सुरक्षित रहा l

सम्मान से खिलत देकर शहजीराजे को दरबार में बुलाया गया तथा अफसोस भी जताया गया कि गलतफहमी के कारण आपको जहमत उठानी पड़ीl बादशाह ने यह भी कुबूल किया कि आपके शक्तिशाली भुजाओं के कारण ही आदिलशाही फक्र से बुलंद हैl परन्तु यह कहकर चालाकी से आदिलशाह ने सर्प का फन कुचलने की बहुत कोशिश की, तलवार का उपयोग नहीं किया परन्तु धूर्तता से बैंगलौर की जागीर, कंदरपी का किला व धोखे से शिवाजी ने अपने कब्जे में लिया कोंढाणा वापस करने की बात कही, इसपर अमल करके वफादारी बरतने का सुझाव दियाl उस क्षण सहमति जताना आवश्यक था अन्यथा शिवाजीराजे ने जो चाल चली थी वह बेकार हो जातीl इसलिए कोंढाणा बादशाह के सुपूर्द करने के आशय का पत्र शहाजीराजे ने शिवबा को भेजाl इससे शिवाजीराजे थोडे नाराज हुए, परन्तु मातृ-पितृ भक्त शिवबा ने उसपर अमल करने की कार्यवाही कीl पिता के पत्र के अनुसार गढ़ बादशाह को देते समय फिरसे अवसर मिलने पर कोंढाणा स्वराज्य में शामिल करने का दृढ निश्चय कियाl इसे कहते है " द्वीपद पुरस्सर, एक पद प्रतिसर "

सन्दर्भ -- राजा शिवछत्रपति

लेखक -- महाराष्ट्र भूषण व पद्म विभूषण बाबासाहेब पुरंदरे

संकलन -- स्वयंसेवक एवं टीम

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