हिन्दवी स्वराज्य स्थापना का 350 वां वर्ष श्रृंखला 89 = कोंढाणा दुर्ग भाग एक
पंत दादाजी कोंडदेव आदिलशाह के दरबार द्वारा कोंढाणा दुर्ग के सुबेदार नियुक्त किये गये थेl उनको शहाजी राजे ने जिजाबाईसाहेब एवं शिवबा के साथ पुणे भेजा था फिर भी वे कोंढाणा के सुबेदार बने रहेl पंत के मृत्यु के पश्चात् बीजापुर दरबार ने मिया रहीम महम्मद को कोंढाणा प्रभाग व दुर्ग पर सुबेदार नियुक्त कियाl वहाँ उस समय सिद्दी अंबर वाहब नाम का किल्लेदार थाl कोंढाणा राजगढ़ के इशान्य दिशा में 12 मील की दूरी पर थाl शिवाजी राजे ने विचार किया यह अभेद गढ़ तो स्वराज्य में होना ही चाहिएl
कोंढाणा के दक्षिण दिशा में खेडेबारा में बापूजी मुदगल देशपांडे ' देशमुख ' थेl महाराज ने अपना विचार उनके समक्ष रखाl बापूजी कोंढाणा की नस - नस जानते थेl दुर्ग अत्यंत दुर्गम थाl परन्तु शिवाजीराजे का विचार था तो गढ़ स्वराज्य में होना ही थाl बापूजी ने अपने मीठे बोलों से किल्लेदार को प्रभावित कियाl इतिहास कहता है, कैसे नहीं पता पर किल्लेदार शब्दों के जाल में फंस गया एवं बापूजी ने उस क्षण का लाभ उठाकर अपने लोगों को किले में प्रवेश दिलाया तथा किला बापूजी के कब्जे में आया - गनिमी कावे से आयाl बिना लडे भगवा ध्वज किले की प्राचीर पर लहराया ।
शिरवळ से कोंढाणा 22 मील की दूरी पर है मिया रहीम महम्मद शिरवळ से कोंढाणा दुर्ग, दरबारी हुक्म के अनुसार अपने अधिकार में करने के लिए निकला तथा उसे खबर मिली गढ़ पर शिवाजी ने कब्जा कियाl यह खबर मिलते ही मिया रहीम शिरवळ वापस गया तथा यह खबर उसने बीजापुर दरबार पहुँचायीl
महाराज ने कोंढाणा गड पर पहरे, गश्त, सेना की व्यवस्था की व तुरंत शिरवळ पर कब्जा किया l
पहले आदिलशाह दख्खन से आनेवाली खबरों पर इतना ध्यान नहीं देता था परन्तु अब पानी सिर से ऊपर जाने लगाl इस बगावत के विरुद्ध तुरंत कोई कदम उठाना ठीक नहीं होगा यह भी वह जानता था क्योंकि उसे मालूम था इससे शहाजीराजे बगावत करेंगे - वह शहाजीराजे जिन्होंने तीन वर्ष निज़ामशाही को अपने गोद में लेकर दिल्ली तख्त के साथ लड़ने की हिम्मत की थी,शहाजी राजे में वह सामर्थ्य था l
इसी समय कर्नाटक से अफजलखान ने पत्र भेजा, " शहाजीराजे बादशाह के साथ बेईमानी कर रहा हैl बादशाह के दुश्मनों को अंदर ही अंदर से सहायता भी करता है, यह दगाबाजी है l "
लहमाजी ज्योति नाम के शाही अंमलदार ने पत्र भेजा था, " कर्नाटक के लोग शहाजीराजे का बहुत सम्मान करते हैं, वह तो यहाँ का बादशाह बन बैठा है l "
दख्खन में शिवाजीराजे की शरारतों में इन पत्रों ने आग में घी डालने का कार्य कियाl आगे जाकर दरबारी हुक्म के अनुसार बाजी घोरपडे तथा मुस्तफाखान ने धोखे से शहाजीराजे को बंदी बनाकर उनके हाथ-पैरों में बेड़ियाँ चढ़ाई l निरन्तर
संदर्भ -- राजा शिवछत्रपति
लेखक -- महाराष्ट्र भूषण व पद्म विभूषण बाबासाहेब पुरंदरे
संकलन -- स्वयंसेवक एवं टीम

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